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motivational story in hindi

सिंधुताई सपकाल- भिखारी की माँ कहलाने वाली महिला जिसने हजारों अनाथ बच्चो को जीवन दिया

खुद दर्द की दवा हो औरों से न दवा ले 

सोफ़े पर परे परे ना पंखे की हवा ले 

मेहनत से बनने वाले पसीने की बात कर 

मर्दों की तरह दुनिया में जीने की बात कर

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ये बोल है एक उस महिला की जिसके हिम्मत, जज़्बे और हौसलों के आगे दुनियाँ की सारी तकलीफों ने अपने घुटने टेक दिए, ये बोल है उस माँ की जिसकी अपनी सगी माँ ने तकलीफ़ के समय उसे अपने  घर से निकाल दिया लेकिन वो खुद हर बेघर बच्चों कि माँ बन गई। 

 

कहते है जिसका कोई नहीं होता उसका ऊपर वाला होता है, लेकिन महाराष्ट्र शहर में जिसका कोई नहीं होता उसका सिंधुताई होती है. 

 

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हिंदियोगी के Motivational Story In Hindi ब्लॉग पोस्ट में.


आज बात करूँगा महाराष्ट्र की सिंधुताई सपकाल के बारे में जो आज हजारों बच्चों की माँ है, 250 दामाद है, 50 बहुएं है और 750 पुरस्कार से सम्मानित है.

सारांश

सिंधुताई का जीवन दुखों से भरा हुआ है. मात्र 10 साल की उम्र में ही उनकी शादी एक 30 साल के व्यक्ति से करवा दी गयी थी. बाद में अपने ही पति द्वारा गर्भावस्था में पीट कर घर से बाहर निकाल दी गयी और एक तबेले में अपनी बच्ची को जन्म दिया। 

 

खुद का और खुद के 10 दिन की छोटी बच्ची का पेट भरने  के लिए उन्हें भीख मांगना पड़ा. शमशान घाट में जलते हुए मुर्दे के ऊपर रोटी सेक कर खाना पड़ा. दुःख से परेशान हो कर कई बार मरने की कोशिश की लेकिन उनके आत्मविश्वास और दूसरों के लिए जीने की लालसा ने उन्हें मरने नहीं दिया।

 

आप भी सिंधुताई के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते है. इस ब्लॉग पोस्ट Motivational Story In Hindi में मै आपको उनके जीवन की वो सारी घटना बताऊंगा जहाँ पहुँच कर कोई भी व्यक्ति जिंदगी से हार मान जाता. लेकिन सिंधुताई जैसी महान आत्मा वाली महिला हमें सिखाती है की इंसान अगर ठान ले तो सफ़ल होना इतना भी कठिन नहीं है जितना हम मान बैठते है.

सिंधुताई कहती है कि 

जिंदगी में अंधकार बहुत है, लेकिन अपने अंदर का दिया बुझने मत देना 

जलाए रखना उम्मीद की चिंगारी, उम्मीद का दिया कभी  बुझने मत देना

सिंधुताई सपकाळ का जन्म 14 नवंबर 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के पिंपरी मेघे गाँव में एक चरवाहे (मवेशी चराने वाले)  के घर हुआ था.

 

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जब सिंधु पैदा हुई तो उसका नाम चिंदी रखा गया  जिसका मतलब होता है फटे, बेकार कपड़े का एक छोटा टुकड़ा। चिंदी का उस गरीब घर में पैदा होना घर वालो के लिए गरीबी में आंटा गीला होने जैसी वाली बात थी.

बचपन में ही हो गयी थी शादी

सिंधुताई पढ़ना चाहती थी परन्तु परिवार बहुत गरीब था इसलिए सिंधु मात्र 4 कक्षा तक ही पढ़ पाई हालांकि सिंधु के पिता चाहते थे की सिंधु और पढ़े लेकिन गरीबी ने उनके हाथ बांध दिए थे . 

 

जब सिंधु 10 साल की हुई तो उसकी शादी एक 30 साल के अधेड़ उम्र व्यक्ति से करवा दी गयी. पति उसे मरता पीटता था और घर के सारे काम काज करवाता था. सिंधु के पास अपने पति के अत्याचार को चुप चाप सहने के अलावा कोई और दूसरा रास्ता भी नहीं था.

 

खैर जिंदगी किसी तरह कट रही थी. 20 साल की उम्र तक सिंधु 3 बच्चों को जन्म दे चुकी थी और अब चौथे बच्चे की माँ बनने वाली थी. उसी बीच गॉव में सिंधु ने वन विभाग (Forest department) के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ दिया। 

 

सिंधु की मांग थी की वन विभाग वाले जो गोबर हम गांव वालो से उठवाते है उसकी कोई मजदूरी हमें नहीं मिलती तो हमें अपने मेहनत की मजदूरी मिलनी चाहिए। सिंधुताई की यह मांग कलेक्टर तक पहुंची और सिंधु की मांग को जायज़ क़रार दिया गया जिसमे सिंधुताई की जीत हुई. 

 

सिंधुताई के इस कदम से गांव के सभी लोग प्रसन्न हुए लेकिन गांव का एक शाहूकार सिंधुताई के इस जीत को अपना अपमान समझने लगा. और सिंधु से बदला लेने की सोचने लगा.

पति ने मार पीट कर घर से निकाला

वह साहूकार सिंधुताई के पति के पास गया और ये कह दिया की तेरी बीबी के पेट में जो बच्चा है वो तेरा नहीं मेरा है. फिर क्या था इस बात पर सिंधुताई का पति आगबबूला हो उठा और जा कर सिंधुताई के पेट पर लात मार दी. 

 

लात लगने से सिंधुताई बेहोश हो कर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ी. उसके बाद उसके पति ने उसका हाथ पकड़ कर तबेले में घसीटता हुआ ले गया और गाय के झुंड के बीच रख दिया और सभी गाय को खोल दिया ताकि गाय के लात के नीचे आ कर सिंधुताई और बच्चा दोनों मर जाए. 

 

सिंधुताई जब होश में आयी तो उसने देखा की बच्ची ने उसके बेहोशी में ही जन्म ले लिया था. सिंधु ने बच्ची को उठाया और रोते हुए अपने सीने से लगा लिया। 

 

बच्ची की गर्भनाल अभी कटी नहीं थी उस वक्त  सिंधुताई के पास कोई उसकी मदद करने वाला भी नहीं था. उसने एक पत्थर उठाया और उसी पत्थर से गर्भनाल को काटने लगी. 

 

सिंधुताई बताती है की 16 पत्थर मारे थे तब जा कर गर्भनाल कटी थी.

 

उसके बाद सिंधुताई अपनी बच्ची को ले कर अपने माँ के यहाँ पैदल निकल पड़ी लेकिन मायके पहुंचने पर सिंधुताई की माँ ने भी उस पर तरस नहीं खाया. उसकी माँ ने भी उसे घर के अंदर आने से मना कर दिया।

जलती चिता पर रोटी सेक कर खाना पड़ा

रहने का जब कोई व्यवस्था नहीं हुआ तो शमशान घाट में रहने लगी. सिंधुताई वहाँ जलती हुए चिता के ऊपर रोटी सेक कर खाया करती थी.

 

कुछ दिन बाद सिंधुताई की हिम्मत जवाब देने लगी. वह बच्ची को ले कर रेलवे ट्रैक पर बैठ गयी. लेकिन सिंधुताई एक माँ थी उसने अपनी बच्ची की तरफ देखा, बच्ची उसे निहार रही थी मनो कह रही हो की जब मारना ही था तो पैदा ही क्यों किया। 

 

सिंधुताई का दिल पिघल गया और उसने मरने का फैसला बदल दिया। वहाँ से उठ कर वो रेलवे स्टेशन गयी और वहाँ एक तरफ लेते एक भिखारी को देखा जो बीमार था. उससे उठा नहीं जा रहा था. 

 

सिंधुताई उस भिखारी के पास गयी वो पानी के लिए गुहार लगा रहा था. सिंधुताई को उसकी हालत देख कर लग रहा था की अब ये मर जाएगा.

 

सिंधुताई ने उसे पानी पिलाया। और कुछ रोटी के टुकड़े खाने को दिए. कुछ देर बाद वह भिखारी उठ बैठा और बात करने लगा. 

 

सिंधु को अंदर से एक सुकून मिला। 10 दिन से जो सिंधु खुद की हालत पर रो रही थी आज एक भिखारी को जीवन दे कर उसे अंदर से आनंद का एहसास हुआ. सिंधु ने सोचा की मेरी ही तरह न जाने कितने असहाय लोग होंगे जिनकी हालत मुझसे भी बदतर होगी। 

 

सिंधुताई ने सोचा अब उनके लिए जीना है जिन्हे एक सहारे की जरुरत है. मेरी माँ ने मुझे घर से निकाल दिया लेकिन में सभी बेघर बच्चों की माँ बनूँगी.  फिर क्या था सिंधुताई के इस आत्मविश्वास ने सिंधु को दोबारा जिन्दा कर दिया। और उसने सभी भिखारी बच्चों को गोद ले लिया। और उनके लिए भीख मांगने लगी.

सिंधुताई से भिखारी की माँ कहलाने लगी

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बाद में सिंधुताई रेलवे स्टेशन पर गाना गाने लगी और उसके बदले में लोग पैसे देने लगे और उस पैसे से सिंधुताई भिखारी बच्चों का लालन पालन करने लगी.

 

उसने ठान लिया की अब मरना नहीं है बल्कि मरते हुए को जिन्दा करना है उन्हें जीवन देना है. उन्हें मुश्किलों में भी जीना सीखना है.

 

सिंधुताई मंदिरों में जाती, भीख माँगती और गाती और वहाँ से जो पैसे मिलते उससे भिखारी बच्चों का लालन पालन करती। 

 

अब लोग सिंधुताई  को माई के नाम से जानने लगे. जिस भी ऐसे बच्चों को देखती जो असहाय है, जिसका देखभाल करने वाला कोई नहीं है उन्हें वो गोद ले लेती और उसकी सारी ज़िम्मेदारी उठाती। 

 

सिंधुताई की अपनी खुद की भी एक बेटी थी. गोद लिए बच्चों को समान प्यार दे सके उसके लिए सिंधुताई ने अपनी खुद की बेटी,’जिसका नाम उन्होंने ममता रखा था, को श्रीमंत दगडूसेठ हलवाई ट्रस्ट को सौंप दिया। 

 

भिखारी बच्चो की देखभाल करने का पूरा भार अपने ऊपर ले लिया। बच्चो को खाना खिलाने से ले कर उनकी पढ़ाई लिखाई, यहाँ  तक की उनकी शादी ब्याह तक की ज़िम्मेदारी संभालने लगी.

 

सिंधुताई के बारे में लोगो को पता चलने लगा. लोग उन्हें माई और भिखारी बच्चों की माँ के रूप में जानने लगे. सिंधुताई अब समारोह में भाषण देने लगी. लोगों को दिशा देने लगी. हारे हुए व्यक्ति में सफलता की किरण दिखाने लगी. उनके इन कामों के चर्चे हर तरफ़ पढ़ा जाने लगा.

 

माई के ऊपर किताबें लिखी जाने लगी. यहाँ तक की माई के ऊपर मराठी भाषा में एक फिल्म (मी सिंधुताई सपकाल) भी बनी है. 

 

उन्हें विदेशों से न्योता आने लगे. माई अब तक 17 देशों का दौरा कर चुकी है. माई को हमारे देश के राष्ट्रपति द्वारा पुरष्कार से भी सम्मानित किया गया है.

 

पुरस्कार की राशि को बच्चों की शादी ब्याह कराने में, उनकी पढ़ाई में खर्च करती है. 

 

आज उनके गोद लिए बच्चे बिज़नेस कर रहे है तो कोई डॉक्टर है तो कोई किसी बड़ी कंपनी में किसी बड़े पद पर है 

सिंधुताई के विचार

सिंधुताई कहती है की अगर आपके जिंदगी में परेशानी दिक्कतें आती है तो ऊपर वाले का शुक्रिया करो और संकट को  सलाम करो क्योंकि यही ऐसी परिस्तिथि है जो आपको आगे का सफल होने का रास्ता दिखाएगी.

दुनिया खुद के लिए मरती है कभी दूसरों के लिए जी कर देखो जिंदगी सफ़ल हो जाएगी।

 

माई कहती है की आज युवा लोग जल्दी भटक जाते है. व्यक्ति हार बर्दाश्त नहीं कर पाता है. प्यार में हारे व्यक्ति के लिए कहती है:- 

 

मेरे जनाज़े के पीछे सारा जहाँ निकला 

मगर वो नहीं निकले जिनके लिए जनाज़ा निकला 

माई कहती है की जिनके लिए तुम मरे उसे ही आपकी कोई फ़िक्र नहीं थी तो आप क्यों अपना वक्त किसी एक के पीछे बर्बाद कर रहे हो. मरना ही है तो किसी ऐसे के लिए मरों जिसे आपकी जरुरत है.

 

बहुत ऐसे लोग है जिन्हे आपकी जरुरत हो सकती है . आपके माता पिता बहन भाई, आस पड़ोस उनके लिए कभी जी कर देखो जिंदगी सफल हो जाएगी। 

 

आज पूरा विश्व उन्हें माई के नाम से जानती है. अब तक सिंधुताई भारत के चारों राष्ट्रपति  A.P.J Abdul Kalam, Pratibha Patil, Pranab Mukharjee और वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति Ram Nath Kovind द्वारा पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी है.

दोस्तों आशा करता हूँ की Motivational Story In Hindi में सिंधुताई की सच्ची कहानी आपको पसंद आयी होंगी। और साथ ही उनके संघर्ष भरे जीवन से आपको भी बहुत कुछ सीखने को मिला होगा।

 

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